मैं चाहूंगी कि आप अपने बारे में पाठकों को कुछ बताएं।

मैं हुकम सिंह दहिया हिंदी उपन्यास “विवेक” का लेखक आप से बात कर रहा हूँ। मेरा जन्म 8 फरवरी 1956 को एक साधारण परिवार में गांव हसनगढ़ जिला रोहतक हरियाणा में हुआ। प्रारंभिक शिक्षा गांव के सरकारी स्कूल में हुई और कला स्नातक की डीग्री गांव के ही DAV College हसनगढ़ से 1978 में प्राप्त की।  1978  में SSC Delhi द्वारा मेरा चयन आयकर विभाग में लिपिक के पद पर कर लिया गया और मैंने 16 जून 1978 को आयकर विभाग(उत्तर-पश्चिम क्षेत्र) जालंधर में अपना पद भार ग्रहण किया और विभिन्न पदों व विभिन्न स्थानों पर रहते हुए 29 फरवरी 2016 को आयकर अधिकारी के पद से फरीदाबाद से सेवानिवृत्ति प्राप्त की। मेरे पिता जी श्री हंसराज दहिया बहुत ही वीर पराक्रमी योद्धा थे जो 20 अगस्त 1964 को जम्मू कश्मीर में भारत पाकिस्तान की सीमा पर पाकिस्तान के विरुद्ध युद्ध करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए जिन्हे मरणोपरांत अदम्य साहस और पराक्रम के लिए पुलिस के सर्वोच्च सम्मान राष्ट्रपति पुलिस पदक से सम्मानित किया गया। मैं साक्षी हूँ उन पलों का जब मेरे पिता जी का पार्थिव शरीर मेरे गाँव हसनगढ़ लाया गया। उस समय मेरी आयु मात्र 8 वर्ष की थी परंतु मेरी चेतना का स्तर काफी ऊंचा था मैंने अपनी संवेदनाओं को संभाल कर रखा है चिंतन की प्रवर्ति बचपन से ही रही है जो 63 वर्ष की उम्र में मेरे इस उपन्यास” विवेक” के माध्यम से प्रकट हो गई है। इसे मैं अपने माता पिता को समर्पित करता हूँ।

आपके मन में इस तरह की शैली में यह पुस्तक लिखने का विचार कैसे आया?

जब मैंने सोचा कि हमारा समाज विशेष रूप से युवा वर्ग शिक्षित होने के बावजूद भी अंधविश्वासों में फंसा हुआ है तथा धर्म व आध्यात्म के नाम पर धंधा करने वाले गलत लोगों के हाथों में खेल रहा है तब मैंने इस पुस्तक के माध्यम से लोगों को जागरूक करने व सही अर्थों में धर्म व आध्यात्म को समझने तथा एक वैज्ञानिक सोच को विकसित करने के लिए एक मनोरंजक कहानी के द्वारा लोगों को सच्चाई से अवगत कराने का प्रयास किया है।

आपको इस पुस्तक को लिखने की प्रेरणा कहाँ से मिली?

मैं समाज को अपनी योग्यता के अनुसार कुछ देना चाह रहा था। मुझे इस पुस्तक को लिखने की प्रेरणा पिछले कुछ वर्षों में देश में घटी घटनाओं से मिली जब एक के बाद एक तथाकथित धार्मिक लोग हत्या और बलात्कार जैसे संगीन मामलों में जेल जाने लगे और उनके अनुयायी फिर भी उनको भगवान मानते रहे तब मैंने सोचा कि हमारी शिक्षा प्रणाली में भारी दोष है जिसके कारण हम अपने विद्यार्थियों में वैज्ञानिक सोच को विकसित नहीं कर पा रहे हैं और न ही धर्म व आध्यात्म का सही अर्थ समझा पा रहे हैं और इसी का फायदा कुछ तथाकथित धार्मिक लोग उठा रहे हैं और भोले भाले लोगों का शोषण कर रहे हैं।

आपकी यह पुस्तक वास्तव में क्या सन्देश देती है?

मेरी इस पुस्तक का उद्देश्य पाठकों को सुंदर व मनोरंजक कहानी के माध्यम से  शिक्षा के द्वारा बुद्धि का विकास करना है ताकि लोग जीवन में अपनी बुद्धि तथा विवेक से काम करना सीख जाएँ और वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाकर अपनी प्रगति करें और अंधविश्वासों से दूर रहकर  अपने विवेक से काम करें।

जब आप इस पुस्तक को लिख रहे थे तब आपके मन में क्या चल रहा था?

इस पुस्तक को लिखते हुए मेरे सामने सबसे बड़ी चुनौती यही थी की मैं किस तरह अपनी बात बिना किसी की भावनाओं को चोट पहुँचाये पाठकों तक पंहुचा सकूँ। मुझे  इस उपन्यास को लिखते हुए अत्यंत सावधानी पूर्वक अपने विचारों को व्यक्त करना पड़ा जो की मेरे लिये काफी कठिन कार्य था।

आप इस पुस्तक को कितना समय देते थे?

वैसे तो इस पुस्तक को लिखने का विचार मंथन लगभग पिछले दो साल से चल रहा था परंतु वास्तव में मैंने इसे मई 2018  से लिखना शुरू किया और लगातार 6 महीने तक केवल यही काम किया और अंततः 23 दिसम्बर 2018 को मैं इसका लोकार्पण करने में सफल हो पाया।

पुस्तक लिखने के दौरान क्या कभी ऐसा लगा कि अब इस विचार को छोड़ दिया जाये?

नहीं, मेरे मन में कभी ऐसा विचार नहीं आया बल्कि मैं तो पूरे मन से इसे लिख रहा था और जल्द से जल्द इसे पूरा करना चाहता था। मैं चाहता हूँ की देश और विदेश के स्कूल, कॉलेज व यूनिवर्सिटीज में इसे पढ़ाया जाए ताकि स्वस्थ समाज का निर्माण हो सके। मैं यह भी चाहता हूँ की कोई फिल्म निर्देशक इस विचार को फिल्म के माध्यम से दुनिया में प्रसारित करे जो पूरी मानवता के हित में होगा।

आप अपने रास्ते में आने वाली आलोचनाओं का सामना कैसे करते हैं?

मैं अपनी बात लोगों के सामने बेबाकी से रखता हूँ और अपने तर्कों के द्वारा उन्हें समझाने की कोशिश करता हूँ। कुछ लोग अपनी संस्कार बद्ध मानसिकता के कारण मुझ से सहमत नहीं हो पाते और आलोचना करते हैं परंतु सत्य को इस से कोई फर्क नहीं पड़ता।

पुस्तक के प्रकाशन की अवधि में प्रकाशक के साथ आपका अनुभव कैसा रहा?

प्रकाशक के साथ मेरा अनुभव बहुत अच्छा रहा। वह काफी समझदार व मिलनसार व्यक्ति हैं। लेखक की बातों को ध्यान से सुनते हैं और किसी भी कठिनाई का समाधान जल्द से जल्द करने की कोशिश करते हैं।

आप नवोदित लेखकों को कैसे सुझाव देना चाहेंगे?

सर्व प्रथम मैं कहना चाहूंगा कि पुस्तकों का गहराई से अध्यन कीजिये क्योंकि पुस्तकें हमारे मन पर गहरा प्रभाव छोड़ती हैं जिससे हमारा ज्ञान वर्धन होता है। भिन्न भिन्न  किस्म के लोगों से मिलिए, समाचार पत्रों, पत्रिकाएं पढ़िए  और पुराणी पीढ़ी के लोगों से मिलकर अपने ज्ञान के भंडार को बढ़ाते रहिये और इस दौरान कोई भी अच्छा सा  विचार पकड़ कर उसे विस्तार दे दीजिए।

पुस्तक समीक्षा: विवेक

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