प्रश्न:- आप पाठकों को अपने बारे में कुछ बताएं |

यह एक अत्यंत कठिन प्रश्न है की किसी व्यक्ति को स्वयं अपने विषय में कुछ कहने अथवा कुछ लिखने को कहा जाये, पर प्रयास करता हूँ की कुछ न्यायोचित कह पाऊँ । मैं स्वदेश मिश्रा ‘शाकद्वीपीय’, मेरा जन्म हज़ारीबाग में सं 01 01 1957 में हुआ था, जो उस समय बिहार में था, आज झारखण्ड राज्य का एक अंग है ।

बचपन अन्य की तरह ही बीता किन्तु 1973 में मेरी माँ के पक्षघात हो जाने के कारन घर का सारा दायित्व मुझ पर आ गया । उस समय मैं मेट्रिक में था । मैं घर का बड़ा लड़का था, मुझसे दो छोटे भाई बहन थे जो काफी छोटे थे । मेरे पिताजी नौकरी करते थे । घर के चूल्हे से लेकर अन्य घरेलु काम और माँ की देख – भाल करते हुए पढाई करता रहा । विचार था डॉक्टर बनने का पर परिस्तिथि अनुकूल नहीं होने के कारन वह स्वप्न ही रह गया । मैंने सनातक हिंदी ‘प्रतिष्ठा’ में किया । सनातक होने के बाद मैं सीमा सुरक्षा बल में सेवारत हो गया ।

मैं आरंभिक समय से ही भावुक प्रवत्ति का और प्रकृति प्रेमी तो था ही और साथ ही सामाजिक कुरीतियों के प्रति विद्रोही स्वभाव का भी था ।
मेरी कल्पना में समाज का एक प्रारूप रहा है, जहाँ सबों में एक दूसरे के प्रति प्रेम, आदर, सम्मान, सुरक्षा की भावना हो । समाज के वरिष्ठ व्यक्ति अर्थात बड़े बुजुर्गों, वृद्ध, अतिवृद्ध व्यक्तियों का भोत सम्मान हो, उन्हें किसी भी आवश्यकता के लिए बिखलना न पड़े, बिलबिलाना न पड़े । स्वयं से भी अधिक उनकी देखभाल हो, वृद्धाश्रम जैसे विचार ही न हो क्युकी यह हमारे समाज का, हमारी धरती की धरोहर है, यह हमारी शोभा है । यह है तो घर की प्रतिष्ठा है, इनकी कमजोरी होती काया में सुख का भंडार हैं ।

प्र. यह किताब लिखने का ख्याल आपके मन में कैसे आया?

जहाँ तक शैली का प्रश्न है वह तो स्वयं की अपनी ही होती है अथवा होनी चाहिए जो सुगमता से हरिदह्यग्राह्य लगे । जो हम कहना चाह रहे हैं और जो हम श्रोता या पाठक को देना चाह रहे हैं, वह तो मौलिक शैली में ही होना चाहिए अन्ययथा कोई भी लेखक स्वयं के साथ न्याय नहीं कर सकता । भाषा कोई भी हो पर, शैली तो अपनी पहचान है । विषय, भाव और परिस्थिति के अनुरूप शब्दों का चयन तो आपकी अपनी ही शैली में होना चाहिए ।

प्र. इस किताब को लिखने की आपको प्रेरणा कहाँ से मिली ?  

समाज लेखक का है और लेखक समाज का होता है । देखना और गौर से देखने में विशाल अंतर है । यह पुस्तक, लिखने की प्रेरणा का स्त्रोत (inspiration ) कहीं जाकर ढूंढने की आवशयकता तो थी ही नहीं और न ही अब है । आपके अपने ही आस पास चारो और समाज, समाज के व्यक्ति, घटित घटनाएं, प्रकृति के विशाल भंडार स्वयं ही प्रेरणा के स्त्रोत हैं । आवश्यकता है उसे मन की आँखों से देखने की । यही तो है देखना और गौर से देखना ।

प्र. आपकी किताब क्या बताती है? 

निसंदेह इस प्रश्न का उत्तर मुझसे अच्छा आप और पाठक दे सकते हैं । मैंने इस पुस्तक के माध्यम से एक नहीं कई विषयों को स्पर्श किया है । पहली कविता पूर्णतः प्रकृति से सम्बंदित है । वहीँ व्यंग के माध्यम से एक बीमार को देखने आने वाले अपनों पर ही व्यंग किया है । ऐसे कईं विषय है जिन पर लिखा गया है जो प्रेरक बन सकते हैं ।

प्र. जब आप ये किताब लिख रहे थे तब आपके मन में क्या चल रहा था?  

ऐसा कोई एक विषय होता तो मैं कहता की बस यही बात मेरे मस्तिष्क में लिखते समय चल रही थी । विभिन विषयों पर लिखते समय ऐसा लगता था की यह जो हो रहा है वह गलत हो रहा है ऐसा नहीं होना चाहिए था ।

प्र. आपने इस किताब को कितना समय दिया?  

मैंने इस पुस्तक के लिए कितना समय दिया इस प्रश्न का उत्तर दिया जा सकता है ? बस वर्षों की तपस्या है यह मेरी । जब भी कोई विषय मेरे दिलों दिमाग में आता था , कागज कलम लेकर बैठ जाता था । पारिवारिक सारी जिम्मेदारियों को निभाते हुए जब भी समय मिलता और विषय मिलते, लिखने का काम आरम्भ कर देता था । फ़ौज में भी ड्यूटी के बाद यही काम करता था ।

प्र. क्या कोई ऐसा पल आया जब आपने सब छोड़ने का मन बना लिया हो?

जैसा की मैं पहले भी कह चूका हूँ की पुस्तक छपने के उद्देश्य से कविता रचने का काम मैंने कभी नहीं किया, मैंने आत्म संतुष्टि के लिए कविताओं का लेखन लिखा । इसलिए पुस्तक लिखने के विचारों से पीछे हटने जैसी सोच का तो कोई अर्थ ही नहीं था ।

प्र. आलोचना को कैसे सँभालते हैं?

यदि चाह और इच्छा प्रबल हो तो आलोचनाओं और आलोचकों से कोई फरक नहीं पड़ता । आलोचक ही आपने काम की दक्षता को दिशाएं देते हैं ।

प्र. ब्लुएरोसे के साथ आपका एक्सपीरियंस कैसा था?

प्रकाशक के साथ मेरा भोअत ही उत्कृष्ट अनुभव रहा है । बहोत सुलझे हुए और प्रबुद्ध व्यक्तियों की टीम है यह प्रकाशन । अत्यंत सहयोग करने वाले हैं ब्लू रोज के प्रकाशक । मैं आशा करता हूँ की मेरी अगली पुस्तक भी आपके प्रकाशन से ही प्रकाशित होगी ।

प्र. नए लेखकों को क्या राय देना चाहेंगे ? 

नवोदित लेखकों को मैं यही सलाह देना चाहता हूँ की जो भी लिखें वह बिना किसी पूर्वाग्रह व् बिना किसी भय के लिखें । लेखक ही समाज को नयी दिशा देते हैं, दिशा निर्धारित करते हैं । मैं पहले भी कह चूका हूँ की साहित्य समाज का दर्पण है और दर्पण कभी झूठा प्रतिबिम्ब नहीं दिखता । अपनी कलम को निबद्ध चलाएं । लेखन को सस्ते मनोरंजन का साधन मत बनने दे ।

पुस्तक समीक्षा – आइना

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