प्रश्न:- आप पाठकों को अपने बारे में कुछ बतातेंं?

मैं रजनी अजीत सिंह बनारस, (वाराणसी, काशी) की रहने वाली हूँ। इस शहर ने बहुत लेखको और कवियों को जन्म दिया है जो हिंदी साहित्य के लिए अनमोल धरोहर हैं। मैं सृजन फार्मा स्यूटिकल प्राइवेट लिमिटेड कम्पनी की डायरेक्टर के पद पर कार्यरत हूँ। मैं अपना काम अपने करने में विश्वास रखती हूँ। कल का काम आज और जो आज करना है वो तुरंत करके हटाने में विश्वास रखती हूँ क्योंकि कल सुबह कौन सी मुसीबत सामने होगी नहीं पता हमें। मुझे इसी पर कबीर दास का दोहा याद आ रहा है जिसे कहना चाहूंगी-

काल करे सो आज कर आज करे सो अब।

पल में परलय होगी बहुरी करेगी कब।।

अंत में यही कहना चाहूंगी “जो समय को पहचानता है, समय उसे पहचान देता है। समय को सही पहचानना ही समय का सदुपयोग है और हमें समय का सदुपयोग करने के लिए हमेशा प्रयत्नशील रहना चाहिए।”


प्रश्न:- किताब लिखने का विचार कैसे आया?

जी मैंने ऐसे ही माँ के सर्गवास के बाद उनको खोने के गम में 1997 से कविता लिखना शुरू किया। उसके बाद डायरी देखने के बाद बच्चों ने वर्डप्रेस और यौरकोट पर ब्लॉग बना दिया जिस पर लिखने के बाद मैं फेसबुक, वर्डस्एप पर शेयर करने लगी। तब कितने लोग जो मोबाइल या आनलाइन पढ़ नहीं पाते थे तो हमने उन लोगों के लिए बुक पब्लिश कराने को सोची और लोगों तक मेरे विचार पहुँच सके तो ब्लू रोज पब्लिशर से बात किया और आज ये पुस्तक आपके सामने है।


प्रश्न:- आपकी किताब क्या बताना चाहती है?

मेरी पुस्तक मेरी जिंदगी का एहसास है जो काल्पनिक नहीं हकीकत की धरातल है। एक प्रकार से कह सकते हैं जीवन के विभिन्न झंझावात से गुजरने के बाद शब्द फूट पड़े हैं जो किताब में है। यदि आप पढ़ेगें तो समाज में अपने आस-पास अपने जीवन का एहसास कहीं न कहीं जरूर पायेगें। हमारी पुस्तक बताती है कि विभिन्न संघर्षों के बाद भी यदि जूनून हो तो क्षेत्र चाहे जो हो उसका सामना कर सफलता अर्जित कर सकते हैं।


प्रश्न:- किताब लिखते समय दिमाग़ में क्या चल रहा था?

कविता लिखती थी पर मेरी पुस्तक पब्लिश होगी ये एक सपना था जो मैं सरस्वती की कृपा मानतीं हूँ। इसलिए पुस्तक लिख रही हूँ ये दिमाग में आया ही नहीं बस  मां सरस्वती की कृपा हुई और लाइन मिलता गया और आज 1997 से लिखा डायरी किताब के रूप में है। इसलिए मुझे यह कहना मुश्किल है कि किताब लिखते समय दिमाग में क्या चल रहा है।


प्रश्न:- किताब को लिखने में कितना समय लगा?

कविता लिखती थी पर मेरी पुस्तक पब्लिश होगी ये एक सपना था जो मैं सरस्वती की कृपा मानतीं हूँ। इसलिए पुस्तक लिख रही हूँ ये दिमाग में आया ही नहीं बस  मां सरस्वती की कृपा हुई और लाइन मिलता गया और आज 1997 से लिखा डायरी किताब के रूप में है। इसलिए मुझे यह कहना मुश्किल है कि किताब लिखते समय दिमाग में क्या चल रहा है।


प्रश्न:- क्या कोई ऐसा समय आया कि लिखने का विचार मन से हट गया हो?

हमनें तो अपना एहसास लिखा था ये किताब बनेगी पता ही नहीं था। हाँ जब पी. डी. एफ ओके हो गया तो मैं उसे कम से कम 15बार पढ़ा होगा कि समाज पर क्या प्रभाव पड़ेगा। पीछे तो नहीं हटी पर मन असमंजस में अवश्य फंस गया था।


प्रश्न:- आलोचकों  को किस नज़र से देखते हैं?

हिंदी साहित्य के दृष्टिकोण से देखा जाए तो आलोचना, समालोचना,समीक्षा तो आम बात है और जहाँ तक मेरे विचार को पूछा जा रहा है कि कैसे संभालेंगे आलोचना को तो मेरे विचार में कबीर दास का दोहा हिंदी साहित्य के लिए उपहार और मेरा विचार भी है। कबीर का दोहा-

निंनदक नियरे राखिये, आँगन कुटि छवाय।

बिन पानी, साबून बिना, निर्मल करे सुभाय।

इसका अर्थ है व्यक्ति को सदा चापलूसों से दूरी और अपनी निंदा करने वालों को अपने पास ही रखना चाहिए, क्योंकि निंदा सुनकर ही हमारे अंदर स्वयं को निर्मल करने के लिए साबुन पानी की कोई आवश्यकता नहीं होती है।


प्रश्न:- प्रकाशक के साथ अनुभव कैसा रहा?

पुस्तक के प्रकाशन के दौरान राष्ट्रीय भाषा हिंदी होने से काफी परेशानी आयी पर पुस्तक के प्रकाशन के दौरान रजनी अजीत सिंह का अनुभव खट्टा कम मीठा ज्यादा रहा है।


प्रश्न:- उभरते लेखकों को क्या सलाह देगें?

हमने अभी तक हिंदी साहित्य में जितने कवियों को पढ़ा उससे बहुत कुछ सीखा है अब उभरते कवियों से आज के दौर में बदलते लोगों के विचारों को उनसे सीखना है ताकि पुरातन और आधुनिकता में समाजस्य स्थापित कर सके। क्योंकि सीखने की कोई उम्र नहीं होती है और हर इंसान से कुछ न कुछ सीखने को मिलता है वो उम्र में छोटे हों या बड़े।

पुस्तक आलोचना – ज़िन्दगी के एहसास

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