प्रश्न:- आप पाठकों को अपने बारे में कुछ बतातेंं?

मैं  पटना(बिहार) का रहने वाला हूं।वैसे, मेरी शिक्षा नालंदा कालेज , बिहार शरीफ में हुई। स्नातक करने के बाद रोज़ी-रोटी की तलाश में पटना आ गया। मैं पढ़ने के समय से ही पत्रकारिता की ओर आकर्षित होने लगा था।उस समय न ज्यादा इलेक्ट्रिक चैनल था और न ही इतने अख़बार थे। काफी संघर्षों के बाद अख़बार में काम तो मिला। लेकिन, वेतन बहुत कम था। उस कठिन समय मेंं  पत्नी का पूरा सहयोग मिला। वर्तमान में पटना से निकलने वाला एक हिन्दी दैनिक समाचार-पत्र में उपसंपादक पद पर कार्यरत हूं।


प्रश्न:- किताब लिखने का विचार कैसे आया?

अख़बार में काम करने के कारण विभिन्न विषयों पर लिखने का मौका मिला। उपन्यास ‘रिपोर्टर’ में अपने 25 वर्षों की पत्रकारिता के अनुभव को लिखने की कोशिश किया हूं। यह किताब पत्रकार-पत्रकारिता, व्यवस्था, मीडिया के प्रति नेताओं की नज़रिया आदि पर केन्द्रित है।
प्रश्न:- इस किताब को लिखने की प्रेरणा कहां से मिली? उत्तर – कुछ को छोड़ दिया जाये तो अधिकांश मीडियाकर्मियों का शोषण होता है। विडम्बना यह है कि पत्रकार दूसरे की समस्याओं को उजागर करते हैं। लेकिन, अपनी समस्याएं नहीं लिख पाते। अगर, लिखेंगे तब छपेगा नहीं, क्योंकि वह प्रबंधक के विरोध में होगा। 


प्रश्न:- आपकी किताब क्या बताना चाहती है?

प्रिंट मीडिया के अंदर क्या-क्या हो रहा है, जो नहीं दिखता । शायद यह पहली किताब है,जिसमें पत्रकारों का शोषण, विज्ञापन घोटाले, दो अख़बारों के बीच वर्चस्व की लड़ाई आदि पर लिखी गयी है। अख़बार के प्रकाशन से लेकर बंद होने तक की स्थिति को दर्शाया गया है। कहानी  कई उतार-चढ़ाव के साथ आगे बढ़ती है। मनोरंजन को ख़याल में रख कर सस्पेंस, एक्शन, हारर, कामेडी, रोमांस, प्रेम-चाहत,नफरत,बदला, गाने आदि शामिल किये गये हैं।


प्रश्न:- किताब लिखते समय दिमाग़ में क्या चल रहा था?

दिमाग़ में एक ही बात थी कि कहानी अच्छी, रोचक और उपयोगी हो।


प्रश्न:- किताब को लिखने में कितना समय लगा?

तीन वर्ष। ज्यादा समय लगने का मुख्य कारण यह है कि लिखने के बाद जब उसे पढ़ता था,तब  संतुष्टी नहीं होती थी। फिर , उसे लिखता और फाड़ देता ।  एक पेज आठ से दस बार लिखता और फड़ता था ।


प्रश्न:- क्या कोई ऐसा समय आया कि लिखने का विचार मन से हट गया हो?

आर्थिक परेशानी कुछ बाधक जरूर बना।मगर, पत्नी और बेटों के सहयोग से मुक्ति पा गया। सहयोग का अभिप्राय। पत्नी किसी चीज के लिए जिद़ नहीं की। मेरे दोनों लड़के अच्छे जाब में हैं और बहुत ही लायक हैं। बहू भी अच्छी है। खुशहाल परिवार के कारण तनावमुक्त हो कर किताब को लिखा। मेरा मानना है कि अच्छी किताब लिखने के लिए लेखक को तनावमुक्त होना चाहिए। खास कर उपन्यास में तो और भी जरूरी है।क्योंकि , इसका विधा अन्य लेखन से अलग है।


प्रश्न:- आलोचकों  को किस नज़र से देखते हैं?

आलोचना उसी की होती है, जिसमें गुण होते हैं। आलोचना वही लोग करते हैं, जिसमें अपने सपनों को सच करने का साहस नहीं होता।


प्रश्न:- प्रकाशक के साथ अनुभव कैसा रहा?

अच्छा रहा।ब्लू रोज पब्लिकेशन के लोग अच्छे और सहयोगात्मक हैं। यह पब्लिकेशन नये लेखकों को प्लेटफार्म देता है। यह अच्छी बात है।


प्रश्न:- उभरते लेखकों को क्या सलाह देगें?

बड़ा सपना को साकार करने के लिए कड़ी मेहनत और दृढ़ ईच्छा शक्ति जरूरी है। मेरा मानना है कि अच्छी किताब वही होती है,जब उसका अंतिम पेज पलटते समय पाठकों को ऐसा लगे जैसे कोई अपना मुझसे बिछड़ रहा है। 

पुस्तक आलोचना: रिपोर्टर

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