प्र. हमारे पाठकों को अपने बारे में कुछ बताइये|

मेरे प्रिय पाठकों सबसे पहले मैं आप सभी को धन्यवाद देता हूँ और खुद को सौभाग्यशाली समझता हूँ, कि आपके साथ अपने पहले नावेल ‘चित्रलेखा एक मुक़द्दस प्रेम कहानी’ के रूप अपने विचारों को आपके सम्मुख व्यक्त कर पा रहा हूँ.मित्रो मैं एक सामान्य किसान परिवार में पला-बढ़ा हूँ, मेरे ईश्वर तुल्य माँ-बाप बृद्ध होने के उपरांत आज भी अपने कृषि कार्य में लगे हुए है. वर्तमान में मैं प्राइवेट विद्यालय में अध्यापन कार्य कर, भविष्य के लिए नये पौधों को रोपित करने का प्रयत्न कर रहा हूँ. अतीत के पन्नो को पलटता हूँ तो पाता हूँ, कि पढ़ाई-लिखाई में मैं भी साधारण लोगों की भांति सामान्य ही था, लोगों से बात करने, सभाओ और मंचों पर बोलने में झिझक होती थी, किन्तु मैंने अपनी इस कमजोरी को परखा .जिसका परिणाम यह हुआ कि आज मुझे लोगों से मिलने बात-चीत करने व मंच पर जाने में झिझक नही होती है.अत: पाठक मित्रों से कहना चाहूँगा, कि अपनी कमजोरियों को दूरकर खुद को दृढ़ और सशक्त बनाये व संसार में अपने प्रतिमान स्थापित करें

प्र. यह किताब लिखने का ख्याल आपके मन में कैसे आया?

बचपन से ही समाज के लिए कुछ कर सकने हेतु मन लालायित रहता था, किन्तु धन और संसाधनो के आभाव में हर बार मन मसोस कर बैठ जाना पड़ता था, जिसकी  वजह से मन में एक अजीब सी वेदना और कुंठा घर कर गयी थी. तभी एक दिन महसूस हुआ, कि क्यों ना कुछ ऐसा किया जाये जिससे समाज को सीख के साथ –साथ कुछ नया पढने का अवसर भी मिल सके. बस यही सोच कर कलम उठाई और लिखना प्रारम्भ कर दिया.      

प्र. इस किताब को लिखने की आपको प्रेरणा कहाँ से मिली ?      

मुझे बी.एड. कक्षाओ के दौरान अपने कक्षा की एक लड़की को अपनी मित्र और मित्रता के लिए रोते हुए देख कर महसूस हुआ, कि संसार में सर्वोच्चता की पदवी पर विराजने वाला मनुष्य दूसरों की भावनाओ और संवेगों को समझने में किस कदर नाकाम नजर आता है.साथ ही यह महसूस हुआ कि प्रेम ही वह शब्दांश या कौशल है,जिसके द्वारा जगत की प्रत्येक भौतिक-अभौतिक वस्तु को परखा जा सकता है. इसलिए मित्रता, प्रेम या उल्फ़त ही मेरी प्रेरणा के आधार बने.  

प्र. आपकी किताब क्या बताती है? 

मेरी यह पुस्तक प्रेम के सच्चे स्वरूप को प्रस्तुत करती है.यह दर्शाती है, कि कैसे एक वामिक (प्रेमी) अपनी निष्ठा व पुनीत भावना से सर्द-महर को भी अफरीदगार की भांति उल्फ़त करती है.वही दूसरी ओर कैसे गाँव की भोली-भाली जनता को चन्द सिक्कों से खरीदकर एक इबलीस प्रधान बन मासूम जनता का नाजायज फायदा उठाता है.      

प्र. जब आप ये किताब लिख रहे थे तब आपके मन में क्या चल रहा था?  

इसे लिखते समय जल्द पूरा कर पाठकों के समक्ष लाने की उत्सुकता थी.जैसा कि यहमेरा पहला प्रयास था.इसलिए लोगों की प्रतिक्रियाओं को जानने की भी तीव्र जिज्ञासाबनी हुई थी.  

प्र. आपने इस किताब को कितना समय दिया?   

वैसे तो इसे लिखने के लिए कोई समय निश्चित नही था, किन्तु जब भी मन द्रवित होता था.कॉपी पेन लेकर बैठ जाता था.फिर हृदय में जो भी भाव आते उन्हें लिख लेता था.  

प्र. क्या कोई ऐसा पल आया जब आपने सब छोड़ने का मन बना लिया हो?

ऐसा कोई भी पल मुझे याद नही है,जब मेरे मन में इसे छोड़ने का विचार आया हो. हाँ कभी-कभी काफीदेर तक पेन कॉपी लेकर बैठे रहने पर भी जब उचित शब्द नही मिलते थे तब बड़ी झुंझलाहटहोती थी. तब कुछ पलों या दिनों के लिए कॉपी पेन बंद करके बैठ जाना पड़ता था.  

प्र. आलोचना को कैसे सँभालते हैं?

मेरा मानना है, किदुनिया में त्रुटियाँ खोजने वालों की कमी नही है. कमियां खोजना और आलोचना करनालोगों का काम है, तो उन्हें अपना काम करने दीजिये. वहीँलिखना मेरा कर्तव्य है तो मुझे लिखते रहने दीजिये. वैसे भी अगर हम दूसरों की परवाहकरेंगे तो कभी भी अपना कार्य ठीक ढंग से नही कर पाएंगे और ना ही हम अपनी मंजिल तकही पहुंच पाएंगे. इसलिए हमें आलोचनाओ की परवाह किये बिना ही अपना कार्य करते रहनाचाहिए.

प्र. ब्लुएरोसे के साथ आपका एक्सपीरियंस कैसा था?

मैं अपने पाठक मित्रों के साथ ही साथ Blue Rose की पूरी प्रकाशन टीम को उनके सहयोग और सुझाव के लिएधन्यवाद देता हूँ. खाशकर अमन सर, साक्षी मैम व वंदना मैम कोजिन्होंने अपने अनुभवों और सुझावों के द्वारा प्रतिपल मेरा उचित मार्ग दर्शन किया. 

प्र. नए लेखकों को क्या राय देना चाहेंगे ? 

मैं अपने सभी हमसाया लेख़कों को उनके उज्ज्वल भविष्यकी शुभकामनाये देता हूँ और आशा करता हूँ कि आप सभी की लेखनी दुनिया में नई क्रांतिलेकर आये.साथ ही सलाह देता हूँ कि किसी भी आलोचना या बाधा की परवाह किये बिना जोभी अपने व दुनिया के लिए लिखे,आत्मा से दिलखोलकर निडर होकर लिखे.

पुस्तक आलोचना: चित्रलेखा

                                                  

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