अफसाना तेरा-मेरा… यानी तू कौन, मैं कौन, तेरा-मेरा मज़हब, तेरी-मेरी जात, तेरा-मेरा मुल्क, तेरा-मेरा रंग । हम सब इसी में फसें हैं । मेरा मज़हब तेरे से अच्छा, मेरी जात तेरे से ऊँची, मेरा मुल्क तेरे से अच्छा । एक जुंग छिड़ी है और हम सब न चाहते हुए भी उसका हिस्सा बन जाते हैं । इंसानियत ही नहीं, अब इंसान का वजूद भी खतरे में है यह अफसाना किसी में बुराई नहीं धुंध रहा, न ही किसी पर कोई इलज़ाम लगा रहा, बस एक आम आदमी की ज़िन्दगी में हुए वाक्यों में रौशनी डालकर, इस तेरा-मेरा को समझने की कोशिश भर है ।

किताब के बारे में:

यह किताब में जात की वजह से दो प्यार करने वाले कैसे अलग हो जाते हैं वो पता लगेगा । सच ही कहा है किसी ने की जात और धर्म के नाम पर इंसानियत ख़त्म होती जा रही है । और लेखक ने अपने शब्दों के जरिये बहोत ही अच्छे ढंग से यह बात ज़ाहिर की है ।

लिखावट और वर्णन:

लिखावट और वर्णन दोनों की अच्छे हैं ।

पुस्तक आवरण एवं शीर्षक:

शीर्षक कविताओं से मेल खता है एवं आवरण भी अच्छी तरह से त्यार किया है ।

पेशेवर:

  • सरल भाषा
  • सुन्दर शब्दों का प्रयोग

विपक्ष:

  • ऐसा लगा की कहीं कुछ तो खली रह गया है

मेरा फैसला:

इस पुस्तक में आपको बहोत ही रोचक कहानी पढ़ने को मिलेगी । कैसे एक अजनबी अलग जात की लड़की से मिलता है, प्यार में पड़ता है और फिर अलग हो जाता है । अच्छे शब्दों के साथ कहानी भी अच्छी लिखी गयी है । एक बार ज़रूर पढ़ें ।

खरीदिये: अफसाना तेरा मेरा

In Conversation with Pradeep Nigam

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