प्र. हमारे पाठकों को अपने बारे में कुछ बताइये |

मैं सरल , साधारण और सामान्य हूँ… बिलकुल आप जैसा । असाधारण होना मेरा ख्वाब नहीं , और मेरे बस की बात भी नहीं ।

प्र. इस किताब को लिखने की आपको प्रेरणा कहाँ से मिली ?

सोच –एक उपज… एक चुनाव है… जिससे हम सहमत होते है, आत्मसात करते है, वे हमारे सोच या विचार बन जाते हैं । उसी तरह समाज के कुछ पहलु को देखता हूँ तो बेचैन हो जाता हूँ । कुछ कर नहीं पाता हूँ या कुछ करने के ख्याल से कि– कुछ बातें , कुछ जज्बातेँ , कुछ कही या कुछ अनकही, आप तक भी पहुचें , जिससे आप चरित्र के साथ न्याय करे । यही मेरे लिए प्रेणना है ।

प्र. आपकी किताब क्या बताती है?

घुटन  ; एक व्यवस्था , एक परिस्थिति , एक समाज , एक परिवार इत्यादि कुछ भी , जब इसके आबो हवा और इसके माहौल में दम घुटने लगता है , इसमें  रहना और इसमें समय बिताना एक एक पल के लिए दुष्वार और भारी लगने लगता है तो इसी मानसिक अवस्था को हम घुटन कहते हैं , जिससे हम तुरंत बाहर निकलना चाहते हैं… खुली हवाओं में साँस लेना चाहते हैं… उस बोझ से हम जल्द से जल्द निजात पाना चाहते हैं । और ऐसे में हरेक धर्म , हरेक समाज में कुछ ऐसे लोग होते हैं जो वर्षों की  परम्परा , कुरुति ,रूढ़िवादी सोच के खिलाफ बगावत कर देते हैं और उसके खिलाफ जाकर एक नया प्रयोग करते  हैं ।

‘’ मिश्रित समाज में उपजी एक कहानी ‘ घुटन ‘ में हिन्दू समाज का एक लड़का और मुस्लिम समाज की एक लड़की , बढ़ते उम्र के साथ हर स्पर्श के अहसास में अंतर था । फिर एक रिस्ता , जो समाज को असहज करने वाला था , लेकिन कहाँ और किससे चूक हुई –कहना बेहद मुश्किल है ।लेकिन अपराध तो अपराध है ,पाप तो पाप है । लेकिन वास्तव में हम तब मुश्किल में पड़ जाते जब गुनाह किसी अपने से अनजाने में ,खेल – खेल में हो जाता है ।

” किसे दोषी माने ?  कैसे उसे कहे ? क्या कहे ? वह तो मेरा प्रिये है ।

गरीबी के चादर में सिमटी हमारी जिंदगी के बीच खिला एक फूल –सिर्फ एक ही नयाब तोहफा और सबूत है , जो हमारे बिखरे जिंदगियों को जोड़ता है –इसे कैसे मुरझाने दूं  ?

यह तो बांसुरी से निकलने वाली  एक स्वरलहरी के समान है , जो हमारे होने का याद दिलाता है ,

इस स्वरलहरी को कैसे धीमा होने दू …। ”   — यही एक पिता का भाव है ।

लेकिन पीएचडी साहेब तो समझदार थे , पढ़े लिखे , कॉलेज में प्रोफ़ेसर थे , उनसे कैसे इतनी बड़ी गलती हो सकती थी ? फिर भी हो गयी थी । किसी ने मज़बूरी कहाँ तो किसी ने अय्याशी । बहुतों ने कहा –पीएचडी साहब इस उम्र में पागल हो गए हैं । लेकिन दोस्तों मुझे विश्वास है ,

शुरू से जानने के बाद आप जरूर हर चरित्र के साथ न्याय करेंगे …।

चरित्र की विशालता अफवाहों और अटकलों में नहीं ,

बल्कि इसे नजदीक से जानने और

इसमें डूबने से पता चलता है ,

वरना धुंधली तस्वीर में सिर्फ धुआँ ही दिखेगा …

यह पुस्तक शुरू से अंत तक समाज के कई रूप को रेखांकित करता है । अनकही , निशब्द वाले भाव में । लेकिन ,सहज रूप से, चरित्र के चहरे ही अपनी टूटी फूटी जिंदगी में अपनी बिबसता ,प्रेम और असीम स्नेह को दर्शा देते हैं ।

जहाँ एक बचपन में प्रस्फुटित होने वाला प्रेम है, तो दूसरी ओर उस समाज के कट्टरता वाले धार्मिक सोच  , जहाँ आज भी उन औरतों और लड़कियों का वही हालात है जो शादियों पहले था । उसी के एक डार्क साइड को छूने का प्रयास किया गया है , जो बताता है कि शायद वे मर्दों का अब भी सिर्फ सुख सुविधा और भोग विलास के लिए बनी हैं ।  जहाँ अब सारे चरित्र , जब अपने आप को मूल्यांकन और अवलोकन करते हैं तो,  एक गहरे घुटन से रूबरू होते हैं । और डूबते – बिछुड़ते अँधेरे में खोये हुए प्रतीत होते हैं ।  ऐसे में एक पिता का अपने बेटे के प्रति गहरा प्यार और लगाव दिखने लगता है , जो उसे कभी उदास और दुखी होते देखना नहीं चाहता है ।

उपर्युक्त कहानी या इसके सन्दर्भ या ऐसी परिस्थिति,  समाज में मौजूद है, बस सिर्फ चुनाव, अवलोकन , प्रेक्षण और विश्लेषण करना है– जैसे अनंत तारों में से एक तारा को चुन लेना है ।

प्र. जब आप ये किताब लिख रही थी तब आपके मन में क्या चल रहा था?

लिखते वक्त हमेशा मेरा ध्यान चरित्र , भाव , क्लाइमेक्स और कहानी के अंत पर रहा ।  कही कोई चरित्र –भाव और क्लाइमेक्स पर हल्का या भारी न पड़ जाये ।  कुछ चीजें ओवर या कम न पड़ जाये ।  उपर्युक्त वर्णित चरित्र , भाव और क्लाइमेक्स कहानी के अंत से भटके नहीं –इसलिए मुझे बार बार पढ़ना पड़ता था । कम या ज्यादा लिखना या मिटाना पड़ता था । चुकी इनमे तालमेल बैठना बहुत जरुरी होता है , वरना रेत की तरह अलग – अलग ही रह जाते । इससे कुछ नहीं बनता । ये मिलते हैं , तभी एक इमारत खड़ा होता है ।

प्र. आपने इस किताब को कितना समय दिया?

ज्यादा नहीं मात्र तीन माह । चुकी हाल ही में , इससे दुगने शब्द वाले किताब लिखा था, जो अभी प्रकाशित नहीं हुआ है । इसलिए रफ़्तार में था , और इसे लिख दिया ।

प्र. क्या कोई ऐसा पल आया जब आपने सब छोड़ने का मन बना लिया हो?

जब मैं पटना पढ़ता था , उस वक्त मैं कभी कभी सैदपुर (,राजेंद्र नगर) अवस्थित सरकारी छात्रावास में जाया करता था और उसमे रहने वाले अपने कुछ दोस्त के साथ कभी कभी रह भी जाता था या मैं खुद भी एमबीए करते वक्त छात्रावास में दो साल तक रहा हूँ , उसका मुझे फायदा मिला और  छात्रावास में रहने वाले विद्यार्थियों का रहन – सहन , हो हल्ला , नाच – गान, पढ़ाई – लिखाई इत्यादि के बारे में लिख पाया ।

प्र. आलोचना को कैसे सँभालते हैं?

रही बात आलोचना कि तो मैं इस पर ध्यान नहीं देता । सबको सुनना पड़ता है । उसका क्या चर्चा करना । नहीं तो राहें मुश्किल लगने लगते हैं । जो अच्छा लगे वही करना चाहिए, उसी की चर्चा करनी चाहिए ।

प्र. ब्लुएरोसे के साथ आपका एक्सपीरियंस कैसा था?

एक बात साफ और स्पष्ट है — अपनी मंजिल हमें तय करना है… रास्ते हमें अख्तियार करना है ।  कोई चीज के लिए अवसर और संभावनाएं अनंत है , जो जितना करेगा उतना पायेगा । हमें आगे वाले को , शिखर वाले को देखना चाहिए ।  तब सोचना है — हमें वहां पहुंचना है या नहीं ? उससे आगे होना है या नहीं ? यदि हाँ , तो काम में ईमानदारी होनी ही चाहिए , नहीं तो सिमित होने में देर नहीं लगती ।

पारदर्शिता और स्पष्टता किसी भी आर्गेनाईजेशन का आधार होता है ।  अतः , मेरा गुजारिश है , इसमें सुधार की गुंजाईश है , इसमें सुधारना चाहेंगे तो सुधार सकते हैं , आपकी मर्जी और , एडिटिंग और मार्केटिंग पर और ध्यान देने की जरुरत है ।  वैसे इसके सभी टीम मेंबर अच्छे हैं । आदित्य भाई अच्छे दोस्त और कुशल काउंसेलर हैं ।

प्र. नए लेखकों को क्या राय देना चाहेंगे ?

रही बात बडिंग राइटर के लिए तो  , मैं यही कहना चाहूंगा कि सभी लेखक चाहे उनकी पहली किताब हो या आखरी , उस पुस्तक के लिए वे बडिंग राइटर ही हैं ।  नयी किताब –नयी सोच ।  नयी कहानी — नयी रचना । सभी किताबों में जान डालने के लिए कठिन से कठिन परिश्रम करना ही पड़ता है ।  इसलिए नए – पुराने से कोई मतलब नहीं, हमें हृदय और सिद्दत से काम करना ही पड़ेगा । हमें अपने काम में कुछ खोजने के लिए डूबना ही पड़ेगा ।

पुस्तक समीक्षा – घुटन

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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