“गरीबी के चादर में सिमटी हमारी ज़िन्दगी के बीच खिला एक फूल – सिर्फ एक ही नायब तोहफा और सबूत है, जो हमारे बिखरी ज़िन्दगियों को जोड़ता है….. इसे कैसे मुरझाने दू?”
“यह तो बांसुरी से निकलने वाली एक स्वरलहरी के समान है, जो हमारे होने की याद दिलाता है, इस स्वरलहरी को कैसे धीमा होने दूँ….”
लेखिन पीएचडी साहब तो समझदार थे, पढ़े-लिखे, कॉलेज के प्रोफेसर थे… उनसे कैसे इतनी बड़ी गलती हो सकती थी? फिर भी हो गयी थी… किसी ने मज़बूरी कहा तो किसीने अय्याशी। बहोतों ने कहा – पीएचडी साहब इस उम्र में पागल हो गए हैं । लेकिन दोस्तों मुझे विश्वास है, शुरू से जानने के बाद आप जरूर हर चरित्र के साथ न्याय करेंगे…।

किताब के बारे में:

इस किताब की कहानी हमें यह बताती है की हम लोग, समाज के नाम पर, कितनी आसानी से लोगो के बारे में ऐसी बातें करने लगते हैं जो शायद सच भी नहीं होती परन्तु सिर्फ हमारी सोच होती है । इस कहानी में भी लोगों ने पीएचडी साहब के बारे में बहोत बातें बनायीं, किन्तु अंत में सचाई ने लोगों को पीएचडी साहब की तारीफ करने पे मजबूर कर दिया । पर अब इस बात को बहोत देर हो चुकी थी ।

लिखावट और वर्णन:

लिखावट और वर्णन दोनों की अच्छे हैं ।

पुस्तक आवरण एवं शीर्षक:

पुस्तक आवरण और शीर्षक दोनों ही किताब के पन्नो से मेल खाते हैं ।

पेशेवर:

  • सरल भाषा
  • पत्रों को सही ढंग से दर्शाया गया है
  • सुन्दर शब्दों का प्रयोग
  • लेखक की मेहनत किताब के पन्नों में दिखती है

विपक्ष:

मुझे कुछ भी इस पुस्तक में बुरा नहीं लगा

मेरा फैसला:

हम कितनी जल्दी लोगों के बारे में बातें बनाने लग जाते हैं जबकि चाहे वो चीज़ सही है या गलत उसका कोई अनुमान भी न हो । वही हुआ इस कहानी में भी । पीएचडी साहब घुट घुट के मरते रहे जबकि उनकी छवि कुछ और ही बानी रही दुनिया के सामने । एक बार पढ़ी जा सकती है । ये किताब वास्तविकता बयां करती है ।

रेटिंग्स: 3/5

खरीदिये: घुटन

सत्येंद्र जी से बातचीत

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