प्र. हमारे पाठकों को अपने बारे में कुछ बताइये |

मेरा जन्म भारत के राज्य मध्यप्रदेश के ग्वालियर शहर में 18/ 10/ 1961 में हुआ। मैने डॉक्टर नीरज बेदी से विवाह किया और दो बच्चों की माँ बनने का मुझे गौरव प्राप्त हुमा। मनोविज्ञान में [ मास्टर आंफ आर्टस ] डिग्री लेने के पश्चात मैने शिक्षा में स्नातक [ B Ed ] की  डिग्री प्राप्त की। स्कूल के बाद से ही लगभग सभी क्षेत्रों में अपनी बहुमुखी प्रतिभाओ (आलराउन्डरशिप )का प्रदर्शन किया और मैने 300 से अधिक सर्टिफ़िकेट और पदक प्राप्त किये। नृत्य , गायन , कहानी , कविता लेखन , विवाद , भाषण खेल- कूद इत्यादि हर जगह अपनी मैं अपनी पकड बनाती चली गई 1978 में मुझे महामहिम राष्ट्रपति माननीय नीलमसंजीवन रेड्डी से राष्ट्रपति सम्मान से सम्मानित किया गया। मैने आकाशवाणी एवं दूरदर्शन —- ग्वालियर, भोपाल , जबलपुर , दिल्ली एवं श्रीनगर में उद्घोषिका एवं आर्टिस्ट के रूप में उदघोषणायें एवं नाटक और संगोष्ठी का संचालन किया। मैने NCC में सी सर्टिफ़िकेट बेस्ट केडिट के रूप में “A” ग्रेड से प्राप्त किया। और बन्दूक़ चलाने में महारथ हासिल कर राज्य स्तर पर कई पदक प्राप्त किया। BSF ( बोर्डर सिक्योरिटी फ़ोर्स ) में मैने स्कूली शिक्षिका के पद पर रह कर फ़ोर्स की –(पासिंग आउट परेड ) के लिये एवं वेल्फेयर के लिये कार्य किया। स्किन स्टीट्यूट डासना में शिक्षण एवं क्षेत्रीय विकास के क्षेत्र में कार्य किया। (ग्रह मन्त्रालय भारत सरकार) की इकाई रक्षा समिति में सम्भागीय कैप्टन बन ग्वालियर और  चम्बल सम्भाग में “दहेज एवं महिला उत्पीड़न ” पर कार्य किया। और तत्कालीन 52 प्रकरणों को न्याय दिलवाया। इसके अलावा महिला थाना भोपाल एवं विभिन्न थानों में भी काउन्सिलिग की। मध्यप्रदेश अल्पसंख्यक आयोग में महिला कोर ग्रुप की मैं वाइसप्रेसिडेन्ट ( उपाध्यक्ष ) रही। एवं सम्पूर्ण मध्यप्रदेश में महिला सश्क्तिकरण के लिये कार्य किया। इन्डस्टियल आर्मी भोपाल में सलाहकार के रूप में रही एवं ” निजी महिला जासूस ” के रूप में  प्रकरणों के अवलोकन के क्षेत्र में महारत हासिल की। मेरा रुझान साहित्य लेखन में रहा। समाज के हर रूप को अपने अनुभव से देख कर कविता , कहानी , उपन्यास , लेख , ब्यंग , एवं संस्मरण में उतारना शुरू कर दिया।  वर्तमान में मैं अलग- अलग समय में –आस्ट्रेलिया , मध्यभारत एवं मध्य पूर्व खाड़ी देश में रह कर अपनी सेवायें दे रही हूँ।

प्र. यह किताब लिखने का ख्याल आपके मन में कैसे आया?

मैं कोई पुस्तक लिखूँगी ये तो कभी भी नहीं सोचा था। हाँ लिखना मुझे बहुत पसन्द है। दरअसल …. मेरा विषय मनोविज्ञान रहा। मैंने अपने जीवन का अभी तक का का सफर यदि ये कहूँ कि जब से होश सम्हाला तभी से समाज के प्रति स्वय् को संवेदनशील पाया है। मुझे बचपन से ही डायरी लिखना पसन्द था। मैं परिवार आस- पास जो भी अच्छा बुरा देखती महसूस करती उसे लिख दिया करती थी। स्कूल कालेज हर जगह मेरी कविताओं ,कहानी , संस्मरणों को बहुत सराहा जाता। बस मैं लिखती गई और लोग पसन्द करते गये। मेरे लिखने के जुनून और प्रतिभा को देखकर मेरे पति और बेटे को लगा कि मेरी रचनाओं को पुस्तक का रूप अब ले लेना चाहिये।

प्र. इस किताब को लिखने की आपको प्रेरणा कहाँ से मिली ?

मेरी अभी तक दो पुस्तकें ———-
“ तुम तो मेरी हो “ और
“ दर्द पिघल रहा है “ आ चुकी है।
“ एक छोर आसमां का “ बहुत जल्दी ही आने वाली है।
लिखने की प्रेरणा तो परिवार और समाज से ही मिली। हाँ मेरा बेटा मेरे लेखन से बहुत प्रभावित है। उसको बहुत अच्छी हिन्दी नहीं आती है। मैं जो भी लिखती हूँ उसको सुन कर हमेशा मुझे लिखने के लिये प्रेरित करता है। हाँ मेरे पति का कहना हैं कि मैं अपने आवेग को रोकू नहीं बहने दूँ। मेरी 10 पुस्तकें लिखकर तैयार हैं , वो चाहते हैं कि लोगों तक मेरी रचनाओं को पहुँचना चाहिये।

प्र. आपकी किताब क्या बताती है?

मेरी किताब समाज की सच्चाई बताती है। रिश्तों का मर्म और दर्द बताती है। प्रेम की पराकाष्ठा बताती है। प्रकृति का सौन्दर्य बताती है। ह्रदय के आवेग में बसे संयोग और वियोग की तडप बताती है। मेरी किताबो में तो वो दिल बसता है जो जन – जन के ह्रदय में धड़कता है।

प्र. जब आप ये किताब लिख रही थी तब आपके मन में क्या चल रहा था?

मेरे मन में जीवन के सच की झाँकी चलचित्र की भाँति चल रही थी। मैं सच जो है वही लिखती हूँ। कल्पनाओं की जगह मेरे लेखन मैं है पर बहुत अधिक नही। हाँ प्रेम और दर्द मेरा पसन्दीदा विषय है।

प्र. आपने इस किताब को कितना समय दिया?

मेरा संकलन तो प्रतिदिन का है। कुछ रचनायें पुरानी है कुछ नयी है। 3,000 से ऊपर कवितायें लिख चुकी हूँ। कैसे बताऊँ कि कितना समय दिया।

प्र. क्या कोई ऐसा पल आया जब आपने सब छोड़ने का मन बना लिया हो?

नहीं लेखनी में तो मेरी आत्मा बसती है। लिखने से जो सुकून मिलता है वो कहीं और नहीं मिलता। इसलिये लेखन तो कभी भी नहीं छूट सकता।

प्र. आलोचना को कैसे संभालती हैं?

आलोचक ही मेरे गुरू हैं। मुझे सही मायने में सिखाते है। मैं हर ब्यक्ति से सीखती हूँ। यदि मुझे आगे मुक़ाम कोई पाना है तो मुझे अपने लेखन में बहुत सुधार करना होगा। मेरा साहित्य विषय नहीं है। ना ही मैं बहुत भारी शब्दों का प्रयोग करती हूँ। हाँ सच्चाई जितनी अधिक सरल शब्दों में जनमानस को भा जाये यही मेरा प्रयास है।

प्र. ब्लुएरोसे के साथ आपका एक्सपीरियंस कैसा था?

ब्लूरोज की तो में तहेदिल से आभारी हूँ। उन्होंने मेरी रचनाओं को पृष्ठ देकर आकार दिया मेरी रचनाओं को पहचान दी। मुझे कभी लगा ही नही कि मेरा लेखन और पब्लिशर्स अलग हैं। मैं देश से बाहर रहती हूँ —— इसके बावजूद पूरा स्टाफ़ मुझे पूरा सहयोग देता है। मैं यही चाहूँगी कि मेरी हर पुस्तक ब्लूरोज से ही निकले।

प्र. नए लेखकों को क्या राय देना चाहेंगे ?

बस यही कहूँगी कि लेखनी को हर्दय से नही आत्मा से जोड़े। सच लिखें , लोगों के मर्म को समझें। हमारे समाज के विघटन को , राजनीति को और देश की जर्जर होते हालात को सम्हालने के लिये अच्छे साहित्य की जरूरत है।
ये तो आपने सुना ही है कि —— “ जहां ना पहुँचे रवि वहाँ पहुँचे कवि “
तो यही कहूँगी कि —————
“ कर बुलन्द तू खुदको इतना कि ,
क़लम की स्याही तेरी हाहाकार मचा दे ,
तेरे शब्दों की आँधी में कलयुग की कालिख मिटाकर ,
मानव सोच में प्रेम और विश्वास जगा दे। “
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