“दास्ताँ-ऐ-कश्मीर” कवितावली यथार्थवाद पर आधारित है । इसमें न छायावाद की गूढ़ता है न श्रृंगार-रस की मधुरता है और न ही वीर-रस का हुंकार है । कवितायेँ कल्पना की पंख लगाकर नहीं उड़ती बल्कि वास्तविकता के धरातल पर घटित घटनाओं से रूबरू कराती है । यह पुस्तक कश्मीर, कश्मीरियन और कश्मीरियों के मिज़ाज़ से परिचय कराती है । कश्मीर में दशकों से चली आ रही दहशतगर्दी और राजनितिक पैंतराबाजी का बखूबी वर्णन करती है, विध्वंसक गतिविधियों के विरुद्ध प्रतिकार व् सह-अस्तित्व को प्रेरित करती है । सर्कार और सेना के सकारात्मक प्रयासों का अपेक्षित फल नहीं मिलने पर ईश्वर को हस्तक्षेप के लिए आमंत्रित भी करती है ।

किताब के बारे में:

यह पुस्तक एक कविता संग्रह है जिसमें कश्मीर के बारे में कवी ने बखूबी तरीके से बताया है । कवी ने बहोत ही अच्छे से भावों को प्रकट कर, कश्मीर में हो रही गतिविधियों पर प्रकाश डाला है ।

लिखावट और वर्णन:

कवी ने जिस तरह से हर एक भावना का वर्णन किया है वह सराहनीये है एवं भाषा भी सरल है ।

पुस्तक आवरण एवं शीर्षक:

पुस्तक आवरण व् शीर्षक दोनों ही कविताओं से मेल खाते हैं ।

पेशेवर:

  • बहुमूल्य भावों का प्रकट
  • दिल को छू जाने वाली कवितायेँ

मेरा फैसला:

यूँ तो बहोत से लोग हैं जो कश्मीर में हो रही गतिविधियों के बारे में चर्चा करते हैं, परन्तु इस कविता में जैसे कवी ने भावों को प्रकट किया है, वह कमाल है । इन कविताओं से पता लगता है की कश्मीर के लोग किन कठिनाईओं में अपना जीवन व्यतीत कर रहे हैं । जो मुझे अच्छी लगीं कवितायेँ, वह हैं – काफिर के घर का पता, बारूदी सुरंगें, मौत और शहादत, एवं बटवारा ।

रेटिंग्स: 4/5

In Conversation with Baleshwar Prasad

 

 

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