प्रश्न: यह किताब लिखने का विचार आपके मन में कैसे आया?

आप हर दिन न्यूज पेपर पढते हैं, TV पर न्यूज देखते हैं कि विलेजर्स को कितने सारे हक मिल चुके हैं. फिर दूसरी तरफ आप यह भी सुन रहे होते हैं कि कही किसी गरीब ने आत्म हत्या कर ली, कही किसी किसान ने भूख से अपनी जान दे दी. जो लोग नहीं जानते कि उन्हे क्या-क्या राइट्स मिल चुके हैं या गवर्नमेंट द्वारा दिये गये हक हम ले कैसे सकते हैं, उन्हे छोड दे तो जो बाकी लोग हैं जिन्हे पता है कि क्या प्रक्रिया अपनानी पडती है गवर्नमेंट से अपने हक लेने के लिये, वे कितने प्रतीशत यह लाभ ले पाते है, और कितना इन ब्यवस्थाओँ से संतुष्ट है?

प्रश्न: इस पुस्तक को लिखने की प्रेरणा आपको कहाँ से मिली?

पीडित विलेजर्स, जो इतनी मेहनत करते हैं. भारत मे खाने-पीने की चीज़े काफी महंगी हैं. काफी ऐसी खाने की चीज़े उसी अनाज से बनती है, जो किसान उगाते है. और यह मारकेट में अच्छे खासे दाम पर मिलती है. इन महंगी चीज़ो को हर कोई खरीद सकता है. मैंने देखा है, बोर्नबीटा या कॉम्प्लान जैसी चीज़े वह ब्यक्ति भी खदीता है जो अपने घर के अन्य खर्च उठाने मे काफी कठिनाई महसूस करता है. मतलब अनाज तरक्की तरीके से बिक रहा है, काफी महंगी उस्तुओ में कंवर्ट किया जा रहा है, फिर किसान के हाथ में कुछ नहीं जा रहा…. क्यो?

प्रश्न: आपकी पुस्तक क्या बताती है?

इतनी सारी सहुलियते, इतने राइट्स, इतने कानून फिर भी गरीब और जादा गरीब क्यूँ होता जा रहा है? महिलायेँ सेफ क्यो नहीँ है? यह सवाल सरकार और समास दोनो से है.

प्रश्न: यह किताब लिखते हुए आपके दिमाग में क्या चल रहा था?

इस बुक को लिखते समय काफी सारे खयाल मेरे मन मे आते रहते थे. जैसे कई बार लगता था कि हम सब ने किसानो की ओर से अपना दिमाग हटा लिया है, उन्हे भूल गये हैं शायद. तभी उनकी यह हालत है. क्यो खुद को गलत लगने वाली चीजो पर बोल उठते हैं, और अन्य कई अनैतिकतायेँ हम खुद करते रहते है? जैसे हम कहीँ भी कूडा फेकना अपना हक समझते हैं और फिर इंतज़ार करते हैं कि सरकार कब इस कूडे को साफ करायेगी?

प्रश्न: आप इस पुस्तक को कितना समय दिया करते थे?

अठारह माह से दो साल में पूरी होने वाली यह बुक एक हज़ार पेजेस की हो जाती अगर मैंने सारे अनुभव डाले होते.

प्रश्न: क्या कभी ऐसा पल आया जब आपने इस पुस्तक को छोड़ने का सोचा हो?

कई बार लगा कि इस विषय पर बुक लिखना (waste) जायेगा. क्योंकि इन प्रोब्लम्स को कौन नहीं जानता होगा? फिर मेरे कहने से क्या बदल जायेगा?

प्रश्न: आप आलोचना को कैसे संभालती हैं?

समाज में ऐसी बहुत सी चीज़े हैं जो बहुत गलत होती है, और आप जान्ते हैं कि वे गलत हैं. इन मे से काफी सारी चीजेँ strong social unity से solve  हो सकती हैं. पर जब आप लोगो को convince करने का प्रयास करते हैं, तो वे हंसते हैं. ऐसे में खडे हो कर लोगो को convince करने के बजाये खुद चल पडो, यही उनके लिये प्रूफ होगा और वे आपके पीछे आयेंगे. इस थॉट से मुझे लिखने के लिये एक comfortable Time मिलता गया.

प्रश्न: ब्लुएरोसे पब्लिकेशन के साथ आपका अनुभव कैसा था?

जो अब तक Bluerose के साथ मेरा  experience रहा, उस्से और कहीँ जादा अच्छा हो सकता था.

प्रश्न: नवोदित लेखकों को क्या कहना चाहेंगी?

Because its my first book तो मेरे पास ऐसी कोइ एडवाईस नहीं है कि मैं उसे किसी के साथ शेयर कर सकू. हाँ अगर वे लोग हमे कोई एड्वाईस देना चाहेँ तो स्वागत है. मगर जनरली कि जो भी लिखा जाये वह सच हो. एक दम सच. सच बोल दो. क्योंकि इस बुक को लिखने के दौरान इतना अनुभव जरूर हुआ कि झूठ पर कलम डगमगाने लगती है.

पुस्तक समीक्षा: बेबाक – हमारे अच्छे दिन

Advertisements