देश की आज़ादी के पश्चात् का सभवतः यह सबसे बड़ा जान आक्रोश था जिस में चलायमान व्यवस्था के प्रति तीव्र विरोध था, इस आंदोलन में देश की आज़ादी के पूर्व में होने वाले आंदोलनों की धमक थी पर एक कुटिल षड्यंत्र ने इसे सफल न होने दिया, या यह कहें की नयी आज़ादी के जन्म लेने से पहले उसकी भ्रूड़ हत्या कर दी गयी, शायद ही फिर ऐसी किसी आज़ादी की चमक दिखे ।

किताब के बारे में:

वैसे तो यह एक काल्पनिक कहानी है परन्तु यह एक सच्ची घटना पे आधारित है । 2013 का समय सबको याद है जब एना हज़ारे जी अनशन पे बैठे थे । उस समय का आंदोलन देश से भ्रष्टाचार हटाने को था । वैसे तो आंदोलन बहोत ही बड़ा था और पुरे देश में सवतंत्रता की एक लहर लेकर आया था, किन्तु कुछ वजहों से वह अपने लक्ष्य से हट गया । इस पुस्तक में हास्य, रोष, और सच्चाई के उद्धरण हैं । लेखक ने एक जुनुन के साथ इस पुस्तक को लिखा है ।

लिखावट और वर्णन:

चरित्र विवरण से लेकर भाषा तक, तिवारी जी ने इस पुस्तक को आकर्षित बनाने के लिए अपनी जान दाल दी । भाषा का प्रयोग बहोत ही अच्छे ढंग से हुआ है एवं जो बातचीत लिखी है, वह बहोत ही मनभावक है ।

पुस्तक आवरण एवं शीर्षक:

पुस्तक का शीर्षक एवं आवरण दोनों ही कहानी से मेल कहते हैं ।

पेशेवर:

  • हास्य रास एवं सच्चाई का अच्छे से प्रदर्शन किया है
  • भाषा सरल है
  • चरित्रों को अच्छे से दर्शाया है
  • संवाद बहोत ही मनभावक हैं

विपक्ष:

मुझे कुछ भी बुराई नहीं दिखी

मेरा फैसला:

देश के वासियों में जागरूकता लाने के लिए एवं 2013 को फिर से जगाने के लिए, यह पुस्तक सही है । शब्दों से लेकर कहानी तक, सब ही बहोत अच्छे तरीके से दिखाया गया है । अगर आप भी उन लोगों में से हैं जिनको राजनीति में दिलचस्पी है, तो यह पुस्तक आपके लिए है । पढ़िए जरूर ।

रेटिंग्स: 4/5

खरीदिये – वह सुबह जो नहीं हो पायी

In Conversation with Udaykant Tiwari 

 

 

 

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